सोमवार, 15 जून 2009

भारतीय जनता पार्टी का संकट

भारतीय जनता पार्टी आज एक बड़े संकट के दौर से गुज़र रही है ! संकट भी बाहरी नही बल्कि उसके अपने संगठन में ही उठा है ! लोक सभा चुनाव के बाद जहा भाजपा को आत्म मंथन करना चाहिए था उसकी जगह पार्टी में आतंरिक कलह शुरु हो गया काफी हद तक ये स्वाभाविक भी है क्योकि जिस संगठन के पक्ष में साड़ी बातें चुनाव से पूर्व थी उसके बावजूद भाजपा को बुरी तरह घुटने टेकने पड़े ! और दुखद रूप से कोई भी पदाधिकारी इसके लिए जिम्मेदारी लेने को तैयार नही है इससे हम क्या कहे ? चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए भी अप्रत्याशित थे क्योकि उसने भी ऐसी उम्मीद नही की थी क्यकी चुनाव से पहले तक महंगाई ,बेरोज़गारी,कम्जूर विदेश नीति मुंबई पर हमला इत्यादि ऐसी घटनाए थी जो कांग्रेस के पक्ष को कमजोर करने के लिए पर्याप्त थी ! फ़िर चमत्कार कैसे हो गया ? वजह ये ही थी की जनता ने क्षेत्रीय दलों को नकार दिया और चुनाव के समय ही भाजपा में उठी मोदी हलचल और जमीन से उठ कर किया गया चुनाव प्रचार जो आम जान तक नही पहुच सका और भाजपा कुछ ऐसे मुद्दे लेकर बैठ गई जिनसे आम जान को कोई मतलब नही होता , निश्चित तौर पे भाजपा के रणनीतिकारों का पुरा दोष है इसमे! उन्होंने जनता की नब्ज को नही पहचाना. और दोष कभी वरुण गाँधी और कभी मीडिया पर डाला ,
वरुण और मीडिया का दोष बहुत नाम मात्र था ! वास्तव में भाजपा पुरे चुनाव के दौरान कही जमीन पे नही दिखी !
जनता भ्रम में रही और उससे फायदा मिला कांग्रेस और राहुल गाँधी को ! भाजपा व्यक्तिगत दोषारोपण की राजनीती में ही उलझी रही ! अटल जी के बाद भाजपा का कोई केंद्रीय नियंत्रण नही है , और आडवानी जैसे बेहद योग्य नेता के समय में ही पार्टी में कई नेतृत्व खड़े हो चुके है तो अनुशासन हीनता स्वाभाविक ही है , कडा अनुशासन और कर्तव्य परायणता किसी भी संगठन का आधारत होते है और भाजपा ये आधार खोटी हुई दिख रही है ! भाजपा वास्तव में अपनी पार्टी विथ अ डिफरेंस की छवि कायम नही रख सकी है ,उसके अंतर्विरोध अनुशासन्हीनता बाहर दिख रही है ! ये संकट भाजपा के लिए खतरनाक हो सकता है क्योकि अडवाणी जी के बाद भाजपा में ऐसी कोई शख्शियत नही दिखाई दे रही है जो पार्टी को एक अनुशाषित नेतृत्व दे सके और नेताओ की महत्वकंषा को नियंत्रित कर सके ! ऐसी स्थिति में पार्ट टूट भी सकती है ये न सिर्फ़ भाजपा के लिए बल्कि देश के लिए भी खतरनाक होगा क्योकि भाजपा एकमात्र ऐसा दल है जो वास्तव में लोकतान्त्रिक कहा जा सकता है अन्य दलों की तरह का भाई भतीजावाद यहाँ कम दीखता है ! भाजपा को इस इस्थिति से जल्दी बाहर आना होगा ताकि जनता का विश्वास बना रहे और भारत दो दलीय व्यवस्था की तरफ़ आगे बढ़ सके जो की राष्ट्रीय राजनीती के लिए आवश्यक है !